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Tuesday, October 13, 2009

जनजातीय समुदाय और रेशम उद्योग - ब्रजमोहन ओझा

शम प्राचीनकाल से ही भारत का ा उत्पादक देश है। भारत में रेशम की चारों किस्में मलवरी, इरी, तसर और मूंगा का उत्पादन होता है। वैसे तो देश के कुल रेशम उत्पादन का आधा से अधिक भाग कर्नाटक में ही उत्पादित किया जाता है, लेकिन तसर रेशम के उत्पादन में झारखंड का स्थान अग्रणी है। भारतीय रेशम उद्योग में तसर रेशम का महत्वपूर्ण योगदान है। झारखंड राज्य के परिप्रेक्ष्य में इसकी महत्ता और भी बढ़ जाती है, क्योंकि तसर रेशम उद्योग आदिवासियों का परंपरागत उद्योग है एवं इनकी संस्कृति से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। झारखंड की तीस जनजातियां इस उद्योग से किसी न किसी रूप से जुड़ी हुई हैं।

झारखंड में वनों का विस्तार लगभग 23,253 वर्ग कि.मी. है जो राज्य के कुल भूमि क्षेत्र का 29.3 प्रतिशत है। तसर रेशम का उत्पादन वनों पर आधारित होने के कारण इसके अनुकूल यहां माहौल उपलब्ध है। एक अध्यनन के अनुसार झारखंड में 60 हजार रेशम कीटपालक परिवार तसर संवर्धन में लगे हुए हैं। विभिन्न पंचवर्षीय योजना अवधि में राज्य में तसर रेशम के उत्पादन में उतार-चढ़ाव होता रहा है। प्रथम योजना के शुरुआती वर्ष 1951-52 में झारखंड में तसर रेशम का उत्पादन 46.80 मीट्रिक टन था जो तृतीय योजना के अंतिम वर्ष 1965-66 में बढ़कर 106-82 मीट्रिक टन हो गया। पांचवीं योजना, जो एक वर्ष पूर्व ही समाप्त कर दी गयी थी, के अंतिम वर्श 1977-78 में उत्पादन बढ़कर 300 मीट्रिक टन हो गया। इसके बाद के वर्षों में इसके उत्पादन में ज्यादा उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है। छठी योजना के प्रारंभिक वर्ष 1980-81 में जहां इसका उत्पादन घटकर 168 मीट्रिक टन पर आ गया, वहीं इसी योजना के समाप्त वर्ष 1984-85 में इसका उत्पादन बढ़कर 290 मीट्रिक टन हो गया। सातवीं योजना के दूसरे वर्ष 1986-87 में अब तक का रिकार्ड उत्पादन 438 मीट्रिक टन हुआ, लेकिन इसके बाद की अवधि में उत्पादन में लगातार गिरावट आयी है। आठवीं योजना के प्रारंभिक वर्ष 1992-93 में 265 मीट्रिक टन उत्पादन हुआ तो नौवीं योजना के प्रारंभिक वर्ष 1997-98 में यह घटकर 144 मीट्रिक टन रह गया। 2001-02 में तो उत्पादन घटकर दो अंकों में आ गया। अत आवश्यकता है इस उद्योग के विकास में आ रही रुकावट को दूर करने व उचित मार्गदर्शन की।

राज्य में कुल 73 हजार करघे चल रहे हैं जिनमें 10.5 प्रतिशत रेशम धागे का उपयोग होता है। अगर उपलब्ध संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग किया जाए तो तसर धागों एवं वस्त्रों के उत्पादन में उल्लेखनीय वृध्दि हो सकती है। इस उद्योग को समृध्द कर राज्य में आर्थिक प्रगति के साथ-साथ पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी में वांछित सुधार भी किया जा सकता है। इससे वानिकी एवं कुटीर उद्योगों के विकास का नया द्वार भी खुलेगा। बदलते परिवेश में वन-संपदा एवं पर्यावरण संरक्षण, ग्रामीण नियोजन एवं बंजर भूमि का उचित उपयोग तथा कुटीर उद्योगों की स्थापना की दृष्टि से तसर उद्योग पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। राज्य के वनों में साल एवं आसन के पेड़ बहुतायत से मिलते हैं जो तसर रेशम कीट के प्रमुख भोज्य पौधे हैं। राज्य की अप्रयोज्य बंजर भूमि पर तसर भोज्य पौधों को लगाकर, वनाच्छादित कर तसर रेशम कीट पालन किया जा सकता है। इसके माध्यम से लाखों लोगों को रोजगार देकर उन्हें विकास के मुख्यधारा से जोड़ा जा सकता है। तसर रेशम उत्पादन की आधुनिक तकनीक का व्यापक प्रचार-प्रसार करने से न केवल तसर रेशम प्राप्ति हेतु वनों पर निर्भरता कम होगी, अपितु जलावन तथा चारे की समस्या का भी कुछ हद तक समाधान होगा। रेशम कीटों के उत्सर्ग के भूमि पर गिरने एवं उनके विघटन से मृदा को पोषक तत्वों की प्राप्ति होगी और भूमि की उर्वरा शक्ति में वृध्दि होगी। तसर रेशम उत्पादन के श्रम आधारित होने के कारण अनेकों गतिविधियों में मानव श्रम सृजन के पर्याप्त अवसर हैं। तसर रेशम संवर्ध्दन द्वारा बेरोजगारी की समस्या के समाधान में सहायता मिलेगी और रोजगार की खोज में शहरों की ओर होनेवाला पलायन भी कम होगा। स्थानीय ग्रामीणों को रेशम उत्पादन और वन प्रबंधन में प्रशिक्षण एवं सुविधाएं प्रदान कर वनों को बिना क्षति पहुंचाए तसर रेशम उत्पादन कार्य करने हेतु प्रेरित किया जा सकता है। भारत की लगभग 50 प्रतिशत जनसंख्या महिलाओं की है जिसमें 70 प्रतिशत महिलाएं ग्रामीण क्षेत्रों में ही रहती हैं। रेशम उद्योग में महिलाओं की भागीदारी 50-60 प्रतिशत है। अतैव झारखंड में रेशम उद्योग में महिलाओं की सहभागिता द्वारा उनके उत्थान की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान किया जा सकता है।